शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

🔥 चार साहिबज़ादे : धर्म की अमर ज्वाला 🔥

 🔥 चार साहिबज़ादे : धर्म की अमर ज्वाला 🔥

सिंहासन हिल उठे ज़ुल्म के, काँप उठा अत्याचार,

जब बाल सपूत खड़े हो गए, बनकर धर्म की दीवार।


आनंदपुर की पावन धरा, साक्षी बनी इतिहास,

जहाँ गुरु के चार रत्नों ने, रच दिया अमर प्रकाश।


अजीत सिंह, जुझार सिंह — रण में गूँजा जयघोष,

लाखों से भिड़ गए निर्भय, चेहरे पर न कोई रोष।


केसरिया बन रक्त बहे, धरती बोली बार-बार,

“ऐसे पुत्रों से ही जीवित, रहता है धर्म संसार।”


ज़ोरावर सिंह, फ़तेह सिंह — नन्हे थे पर वीर महान,

ईंट-ईंट में चुनवा गए, भारत का स्वाभिमान।


ठिठुरती दीवारें बोलीं, गवाही दे सारा काल,

“धर्म नहीं छोड़ा बालकों ने, टूटी पर न उनकी ढाल।”


न झुके, न डरे, न बिक सके, न बदला अपना पंथ,

बाल हृदय में सिंह बसे, साँस-साँस में गुरुमंत्र।


मौत भी शीश झुका गई, देख उनका आत्मबल,

अमर हो गया हिंदुत्व, अमर हुआ हर एक पल।


कोटि-कोटि नमन साहिबज़ादों, तुम भारत की शान,

जब तक सूरज-चाँद रहें, गूँजे तुम्हारा गान।


धर्म रक्षा का पथ दिखा गए, लिख गए अमर विधान,

“सिंह वही जो शीश कटाए, पर न छोड़े स्वाभिमान।”

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पुरुषसूक्त से क्वांटम ब्रह्मांड तक

पुरुषसूक्त से क्वांटम ब्रह्मांड तक: क्या ऋग्वेद का “पुरुष” Space-Time और Quantum Reality की ओर संकेत करता है? क्या समय वास्तव में सभी के लि...